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फ़रवरी 2008


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ब्लॉग्स (24)
बुधवार, 15 अगस्त 2007 को भारत का 60वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। इस विषय पर तमाम प्रकार के आलेख-निबंध-समाचार-फी... आगे पढ़ें...

मैं ने देखा एक बूँद सहसा उछली सागर के झाग से रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से। मुझ को दीख गया: सूने विराट् के सम्‍मुख हर आलोक-छुआ अपनापन है उन्‍मोचन नश्‍वरता के दाग से! अज्ञेय आगे पढ़ें...

कितनी नावों में कितनी बार कितनी दूरियों से कितनी बार कितनी डगमग नावों में बैठ कर मैं तुम्हारी ओर आया हूँ ओ मेरी छोटी-सी ज्योति ! कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल । कितनी बार मैं, ... आगे पढ़ें...

आजकल टीवी पर एक विज्ञापन देख रहा हूं.....यह एक विज्ञापन नहीं बल्कि पूरे विज्ञापनों की एक सीरीज है......औरतों और मर्दों दोनों के लिए है......फेयर एंड लवली वालों ने बनाई है.....वे खुशखबरी दे रहे हैं कि अब वे मर्दों के लिए भी गोरेपन वाली क्रीम ले आए ... आगे पढ़ें...




विचारों और वस्तुओं की हर धारणा व अवस्था अपने विपरीत की दिशा में बढ़ती है और एक उच्चतर और जटिलतर इकाई बनाने के लिए उस विपरीत के साथ एकाकार हो जाती है ..विकास की क्रिया विपरीत ध्रुवों के घुलने-मिलने की सतत प्रगति है। फ़िक्ते ने ठीक कहा था स्थापना (thesis), ... आगे पढ़ें...

शिष्य है विसर्जन। शिष्य है समर्पण। शिष्य है आध्यात्मिक अर्थों में परम आत्मघात। अपने को पोंछ देना। एकदम से यह पोंछ देना संभव नहीं होता, नहीं तो व्यक्ति सीधा परमात्मा में विलीन हो जाए, सद्गुगुरु की बीच में सीढ़ी आवश्यक न हो। सद्गुगुरु की सीढ़ी आवश्यक होती है, ... आगे पढ़ें...

ब्राज़ील से मिली उपग्रह की एक सूचना से पता चला है कि आमेज़न के जंगलों को तेज़ी से नष्ट किया जा रहा है. सूचना के अनुसार हाल के वर्षों में जंगलों के कटने की गति चालीस प्रतिशत बढ़ी है और यह पिछले दशक से ज्यादा तेज है आगे पढ़ें...

हर किसी के भीतरएक गीत सोता हैजो इसी का प्रतीक्षमान होता हैकि कोई उसे छू कर जगा देजमी परतें पिघला देऔर एक धार बहा दे।पर ओ मेरे प्रतीक्षित मीतप्रतीक्षा स्वयं भी तो है एक गीतजिसे मैने बार बार जाग कर गाया हैजब-जब तुम ने मुझे जगाया है।उसी को तो आज भी गाता ... आगे पढ़ें...

मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती हैतारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती हैक्यों कि तुम हो।फुटकी सी लहरिल उड़ानशाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती हैजुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ कीअनपहचाने अभिप्राय सी किरण चमक जाती हैक्यों कि ... आगे पढ़ें...

सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल।झाड ऊँचे और नीचे,चुप खड़े हैं आँख मीचे,घास चुप है, कास चुप हैमूक शाल, पलाश चुप है।बन सके तो धँसो इनमें,धँस न पाती हवा जिनमें,सतपुड़ा के घने जंगलऊँघते अनमने जंगल। सड़े ... आगे पढ़ें...

वर्तमान दौर इलेक्ट्रॉनिक मी़डिया का है......यह टीवी मीडिया लोगों का चेहरा बना और बिगाड़ रहा है.....लोग खुश हैं क्योंकि वे मशहूर हो रहे हैं......उन्हें लग रहा है कि दुनिया उन्हें देख रही है और खुशी और गम में उनका साथ दे रही है........इन बातों को भुनाने के ... आगे पढ़ें...

मन हमेशा ताजा , युवा , अबोध ,ओजस्विता और उमंग से सरोबार हों ।इसके लिए काफ़ी चेतना की जरूरत होगी । तुम्हारे मन में क्या हो रहा है ,यह चेतना । इसी स्थिति में हम कुछ सीखते हैं ।मन में चल रहे भावों को सही और गलत के खाँचों में बाँटने की जरूरत नहीं , क्योंकि ऐसा ... आगे पढ़ें...

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