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18 फ़रवरी, 2008


ब्लॉग्स (3)
मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती हैतारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती हैक्यों कि तुम हो।फुटकी सी लहरिल उड़ानशाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती हैजुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ कीअनपहचाने अभिप्राय सी किरण चमक जाती हैक्यों कि ... आगे पढ़ें...

सतपुड़ा के घने जंगल। नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल।झाड ऊँचे और नीचे,चुप खड़े हैं आँख मीचे,घास चुप है, कास चुप हैमूक शाल, पलाश चुप है।बन सके तो धँसो इनमें,धँस न पाती हवा जिनमें,सतपुड़ा के घने जंगलऊँघते अनमने जंगल। सड़े ... आगे पढ़ें...

वर्तमान दौर इलेक्ट्रॉनिक मी़डिया का है......यह टीवी मीडिया लोगों का चेहरा बना और बिगाड़ रहा है.....लोग खुश हैं क्योंकि वे मशहूर हो रहे हैं......उन्हें लग रहा है कि दुनिया उन्हें देख रही है और खुशी और गम में उनका साथ दे रही है........इन बातों को भुनाने के ... आगे पढ़ें...