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20 फ़रवरी, 2008


ब्लॉग्स (5)



विचारों और वस्तुओं की हर धारणा व अवस्था अपने विपरीत की दिशा में बढ़ती है और एक उच्चतर और जटिलतर इकाई बनाने के लिए उस विपरीत के साथ एकाकार हो जाती है ..विकास की क्रिया विपरीत ध्रुवों के घुलने-मिलने की सतत प्रगति है। फ़िक्ते ने ठीक कहा था स्थापना (thesis), ... आगे पढ़ें...

शिष्य है विसर्जन। शिष्य है समर्पण। शिष्य है आध्यात्मिक अर्थों में परम आत्मघात। अपने को पोंछ देना। एकदम से यह पोंछ देना संभव नहीं होता, नहीं तो व्यक्ति सीधा परमात्मा में विलीन हो जाए, सद्गुगुरु की बीच में सीढ़ी आवश्यक न हो। सद्गुगुरु की सीढ़ी आवश्यक होती है, ... आगे पढ़ें...