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खोजी पत्रकारिता और हम पत्रकार

बाजारी ताकतों से अब शायद ही उबर पाएगी पत्रकारिता

अभी कुछ दिन पहले एडिटर्स गिल्ड का कार्यक्रम हुआ था, इसमें गिल्ड के अध्यक्ष मेहताजी के अलावा, आउटलुक के संपादक आलोक मेहता और तहलका वाले तरुण तेजपाल के संबोधन प्रेस में आए थे.....मैंने भी उन्हें देखा-पढ़ा......मैं तत्काल ही अपने विचार आप लोगों के समक्ष रखना चाहता था लेकिन किसी कारण से सामने नहीं रख पाया.....असल में उस कार्यक्रम में उक्त तीनों दिग्गजों ने वर्तमान खोजी पत्रकारिता को लेकर अपने विचार रखे थे और कहीं हद तक यह बात की थी कि अब वो दौर नहीं रहा जब पत्रकारिता समाज की बुरी शक्लों की पोल खोलती थी......इंडियन एक्सप्रेस का बोलबाला था और था अरुण शौरी का बोलबाला...... जिन्होंने खोजी पत्रकारिता को नए आयाम दिए थे.....उस कार्यक्रम में बाजारी ताकतों को भी खूब कोसा गया.....पत्रकारिता को मैनेजेरियल बोला गया.......और कहा गया कि खोजी पत्रकारिता का वह दौर वापस शुरू होना चाहिए......

तो मेरे पत्रकार भाइयों और अपत्रकार भाईयों भी......इसमें मेरा कहना है कि जो लोग यह सब बोल रहे थे असल में वे खुद इस भंवर में फंसे हुए हैं कि वे पत्रकार हैं या मैनेजर (तरुण तेजपाल अपवाद हैं)..........पत्रकारिता में मैनेजिरियल कॉन्सेप्ट पर मैं क्या बात करूं....बस सिर्फ यह बता रहा हूं कि बड़े अखबारों में एडिटर बनाने के लिए अब एमबीए अनिवार्य कर दिया गया है और भास्कर ग्रुप आईआईएम, इंदौर में अपने सभी स्थानीय संपादकों को मैनेजर बनने की ट्रेनिंग दिलवा रहा है......एक बार कोई मुझसे कह रहा था...(जब मैं दैनिक भास्कर, जयपुर में था)....कि अब संपादक सरक्युलेशन मैनेजर भी बन रहा है......उसकी योग्यता का एक आधार यह भी बन गया है कि उसके एडिशन की कॉपियाँ कितनी बढ़ीं...????

तो भाइयों जिन लोगों ने उक्त कार्यक्रम में खोजी पत्रकारिता की मरणासन्न स्थिति पर अफसोस जाहिर किया असल में वे सब दिग्गज भी बाजारी जरूरतों के आगे नतमस्तक हैं.....असल में वे नहीं हैं.....उनके मालिक हैं, इसलिए ही वे भी हैं.......वो मालिक अपनी पत्रिकाओं या पत्रों को बाजार में स्थापित करने के लिए शुरूआत में धुँआधार खोजी पत्रकारिता का सहारा लेते हैं (क्योंकि उन्हें पता होता है कि जनता इसी से ही आकर्षित होती है).....और एक बार जैसे ही उनकी पत्रिका या पत्र का नाम स्थापित हो जाता है तो फिर बाजार की जरूरतों के हिसाब से तेवर बदल लिए जाते हैं.......एक बड़े अखबार का उदाहरण सामने है......(उसका नाम और प्रदेश का नाम नहीं बता रहा हूं क्योंकि उससे आप लोग समझ जाएँगे, लेकिन वो पत्रकारिता जगत का बहुत प्रतिष्ठित अखबार है).....कि उस अखबार के मालिकों की मुख्यमंत्री से पट नहीं रही थी.....छह महीने तक उस अखबार ने सरकार के खिलाफ जो धुँआधार रिपोर्टिंग की...कि सारे लोग वाह-वाह कर उठे.....सरकार के सारे कच्चे-चिट्ठे सामने ला दिए......फिर अचानक सब कुछ सामान्य हो गया....मुख्यमंत्री की फोटो भी फ्रंट पेज पर दिखाई देने लगी......अब मैं तो क्या उस राजधानी का बच्चा-बच्चा समझ गया होगा कि कहां जाकर सेटिंग हुई है.....तो भाईयों उस दौरान अखबार के सारे रिपोर्टर खोजी पत्रकार थे और समझौते के बाद फिर सामान्य रिपोर्टर बनकर रह गए......तो मालिकों का तेवर खोजी बनने और बने रहने में दिशा देता है......मुझे नहीं लगता एेसे में ज्यादा कुछ होने की गुंजाइश है क्योंकि अखबार भी आजकल एक इंडस्ट्री ही हैं....मीडिया इंडस्ट्री.......और अगर आप-हम जैसे इक्के-दुक्के लोगों के सिर खोजी पत्रकारिता का भूत सवार होगा तो पहले तो हमें अपना अखबार निकालना होगा जिसके लिए कई करोड़ रुपया चाहिए होगा......उतने करोड़ रुपए कमाने में हमारे सिर से या तो खोजी पत्रकार बनने का भूत उतर चुका होगा या हम इस विचार को ही त्याग चुके होंगे......हां अगर छोटे स्तर पर अखबार शुरू करेंगे भी तो...... या तो उसे कोई पढ़ेगा नहीं या फिर वो अखबार और हम स्वयं पीत पत्रकारिता के शिकंजे में जकड़े जाएँगे, क्योंकि हमारे आगे इन बाजारी ताकतों के कारण अस्तित्व का संकट आ जाएगा........अब पत्रकारिता में खोज की शुरुआत कहाँ से होगी यह मुझे नहीं पता, हां इसमें रुपयों की खोज जरूर शुरू हो चुकी है जो फिलहाल अनंत दिख रही है.....आशा है कि आप लोग इन बातों को समझ रहे होंगे....

आपका ही सचिन....।
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