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• बजट की घोषणाएँ और लॉलीपॉप में समानता

चिदंबरम व्यक्तिगत रूप से आम आदमी और साधारण भारत को पसंद नहीं करते

भारत के अभी तक के कुछ सबसे योग्य वित्त मंत्रियों में से एक पी.चिदंबरम ने भारत की जनता पर लाखों करोड़ रुपयों की बौछार कर दी.....ये लोग खुश हो रहे हैं कि हम पगले भारतवासी इन घोषणाओं से मंत्रमुग्ध होकर इन्हें फिर से वोट देकर सत्ता की चाबी देंगे.....और अज्ञेय जी की कविता वाली स्टाइल में इन्हें बताएँगे कि हम वध्य कैसे हैं.......????

तो दोस्तों मेरी बातों को पहेली ना समझे.....चिदंबरम के बारे में थोड़ा बताता हूं......इन्होंने हाल ही में एक किताब लिखी है जिसके विमोचन अवसर पर ये कह रहे थे कि भारत हमेशा से ही भिखमंगों का देश रहा है और जो भारतीय इस गफलत में जी रहे हैं कि भारत कभी सोने की चिड़िया था तो उन्हें अपनी जनरल नॉलेज सुधार लेनी चाहिए.....इन्होंने यह भी बोला कि धर्म भारत को बहुत नुकसान पहुँचाता है और इकॉनोमिक रिफार्म या कहें सुधार के लिए हमें जीवन में सिर्फ रुपयों यानी आर्थिक मजबूती को महत्व देना चाहिए......तो ये चिदंबरम साहब जब किसानों के लिए ६० हजार करोड़ रुपयों की कर्ज माफी की घोषणा करते हैं तो सच बताऊं तो मुझे तो कुछ नकली-नकली सा लगता है....क्योंकि पिछले चार सालों में ये हमारी एेसी-तैसी करते रहे तो अब दया क्यों......यह सिर्फ लॉलीपॉप नहीं लगती क्या????

तो दोस्तों दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि हमारे इस चशमा पहनने वाले वित्त मंत्री ने एेसी हालत कर दी है कि इस देश में सिर्फ किसान ही खुदखुशी नहीं कर रहा है बल्कि आम आदमी भी कर रहा है ( कभी मकान की किश्तें नहीं चुका पाने के कारण तो कभी बच्चों को ठीक से परवरिश ना देने के कारण) लेकिन उसकी आत्महत्या सिर्फ अखबारों के सिंगल कॉलम में सिमट कर रह जाती है जबकि नेता लोग अपने वोटों की खातिर किसानों की खुदखुशी को विधानसभाओं और संसद तक ले जाते हैं.......चिदंबरम साहब कह रहे हैं कि देश में आम आदमी का वेतन बढ़ रहा है तो उसपर टैक्स लगाने में क्या हर्जा...... अब मैं थोड़ा व्यक्तिगत हो रहा हूं.......कि पिछले दस वर्षों से घर से बाहर रह रहा हूं सिर्फ इस रुपया कमाने के चक्कर में......कई नौकरियां बदल डालीं कि कहीं महंगाई से रेस नहीं हार जाऊं......अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से कर पाऊँ......तो यह सब तब है जब मैं काफी पढ़ा-लिखा हूं और गाँव का भी नहीं हूं......तो आम भारतीय का क्या होता होगा........गाँवों से पलायन कर शहरों में आना और वहाँ पहुँचकर गंदगी के बीच नरकीय जीवन जीना सिखाया है चिदंबरम ने......

यह सरकार इकॉनामिक रिफार्म की बात करती है.......पेट्रोल...दाल..चावल....सब्जियों के भावों में जो अंतर आया है उससे तो साधारण आदमी सिर्फ कुछ प्रकार का साधारण खाना खाने के लायक ही रह गया है.....अब उसके बच्चे कई प्रकार के पकवानों और दाल-सब्जी का स्वाद भी नहीं ले पाएंगे..........चिदंबरम की माना की भारत सोने की चिड़िया नहीं रहा होगा तो क्या देशी-विदेशी कंपनियों को फायदा पहुँचाने के लिए ये हमें मिट्टी में मिला देंगे.........ये बजट असली चिदंबरम ने पेश नहीं किया है, यह सरकार उन गरीबों के लिए नहीं है जिनके बारे में कांग्रेस पिछले ६० सालों से बातें करती आ रही है......वो व्यक्ति (चिदंबरम) इस देश में गरीबों को देखना ही नहीं चाहता....ये तो सोनिया गाँधी और संप्रग का बजट है जो दोबारा सत्ता में आना चाहती है.........ये लोग जानते हैं कि हमारे देश की जनता जल्दी भूलती है और पिछले चार सालों में हमारे साथ जो किया गया वो हम इस लॉलीपॉप को चूसने से भूल जाएँगे, पिछले कई बजट की लोकलुभावन घोषणाएँ आज तक पूरी नहीं हुईं जबकि महंगाई अगले रोज की रात से ही लागू हो जाती है........ मुझे लगता है कि जो लोग चिदंबरम और इस सरकार को समझे हैं वो मेरी बातों को भी समझेंगे.........

आपका ही सचिन....।
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 प्रतिसाद

Re: बजट की घोषणाएँ और लॉलीपॉप में समानता
खरबुजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबुजे पर , हर हमेशा हुआ है बेचारा खरबुजा हलाल . जनता को ददिखा कर राहत का लालीपाप , उल्टे छुरे से किया जाता है हरदम हलाल .
Re: बजट की घोषणाएँ और लॉलीपॉप में समानता
साचिनजी नमसकार , जब भी मै नेट खोलता हु तो सबसे पहाले आपका लेख पड्ना चाहाता हु, अभी बीच मे शायद अपनी व्यस्ता की वजह से आप कुछ नही लीख रहे थे. आप अपने अमुल्य समय मे से कुछ समय नीकालकार हर रोज लीखते रहे. आप से यही नीवेदन है.
Re: बजट की घोषणाएँ और लॉलीपॉप में समानता
धन्यवाद मित्र सुशील......आप जैसे लोगों की वजह से ही मैं लिख पा रहा हूं....एेसी बातें निश्चित ही मेरा हौंसला बढ़ाती हैं......फिर से धन्यवाद....।