आज पीटीआई पर एक खबर आई कि दिल्ली में डॉग पार्लर यानी कुत्तों को सजाने-संवारने की दुकानों का चलन काफी बढ़ गया है...रईस अपने कुत्तों को इन पार्लरों में लेकर आते हैं और एक सत्र यानी एकाध घंटे के एक हजार रुपए से लेकर बीस हजार रुपए तक अपने कुत्तों पर खर्च कर देते हैं। कुत्तों के मालिक चाहते हैं कि उनका कुत्ता किसी रॉक स्टार से कम ना दिखे और इसके लिए वो उसे शैंपू, हेयर कट, मसाज, पॉ यानी पंजों की मालिश और ना जाने क्या-क्या करवाते हैं.....???
मैंने जबसे इस खबर को पढ़ा है बैचेनी से बैठा हुआ हूँ.....समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं......बीस हजार रुपए अपने कुत्ते पर....... वो भी कुछ घंटों के......इतने रुपए में आपका या हमारा बच्चा सालभर एक अच्छे स्कूल में पढ़ सकता है......किसी गरीब के बच्चे की पूरे जीवन की शिक्षा इतने रुपयों में हो सकती है और किसी गरीब की बेटी का ब्याह भी इतने रुपयों में हो जाता है.......तो हमारे देश को तो देखिए और देखिए उस नवधनाढ्य पीढ़ी को जो अपने कुत्तों पर हजारों-लाखों रुपया खर्च कर रही है........उस भारत देश में जिसमें आज भी २६ करोड़ लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन करने को मजबूर हैं.....गरीबी की रेखा यानी वो लोग जो अपना रोज का खर्चा एक डॉलर यानी ४० रुपए से भी कम रुपए में चला रहे हैं.......उस देश में जहाँ आज भी कई जानें ठीक से पेट ना भरने और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज ना करवा सकने के कारण चली जाती हैं..........अब हमारे देश में कुत्तों की कीमत इंसानी जान से ज्यादा हो गई है......अब यह भी तय होता जा रहा है कि स्थितियाँ अगर एेसी ही रहीं तो देर-सबेर यहाँ मैक्सिको जैसी हालत होगी और रईसों के घर बुरी तरह लूटे जाएँगे......
आप लोग कह सकते हैं कि मैं कुछ ज्यादा ही निगेटिव बातें कर रहा हूँ.....लेकिन क्या करूं जान जलती है जब पता चलता है कि हमारे देश में अर्थ की असामनता बढ़ती ही जा रही है.....यह खाई इतनी गहरी और चौड़ी होती जा रही है कि आम आदमी इसे ना तो कभी लांघ पाएगा और ना ही पाट पाएगा.......इसके बाद क्या होगा, इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि देश में नक्सली गतिविधियाँ सात राज्यों में फैल चुकी हैं.......नक्सलियों का ध्येय क्या है यह आप लोगों को बताने की जरूरत नहीं.....बस इतना ही कि वे अतिसंपन्न लोगों के जान के दुश्मन हैं.......माओ को मानते हैं और बंदूक की नली से क्रांति किए जा रहे हैं.......मैं उस आंदोलन को बिल्कुल उचित तो नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन यह तय है कि अगर हालात एेसे ही चलते रहे तो एक समय देश का बेरोजगार युवा भूखा मरने के बजाए उनके साथ मिलकर बंदूक उठाने से नहीं चूकेगा और फिर हमारे अतिप्राचीन समाज का क्या होगा यह डिबेटेबेल बात हो सकती है......
बात कुत्तों से शुरू हुई थी तो उन्हीं पर खत्म करूंगा कि आजकल बाजार में एक हजार से लेकर पाँच लाख रुपए तक के कुत्ते के पिल्ले आ रहे हैं, रईस उन्हें झूरकर खरीद भी रहे हैं......आम आदमी अपने आशियाने का सपना पूरा नहीं कर पा रहा है और इस देश की एक पीढ़ी उतनी कीमत के कुत्ते के पिल्ले खरीद रही है.....ये कुत्ते के पिल्ले इंसानों पर इतने ज्यादा भारी पड़ेंगे पता नहीं था.....क्या ही अच्छा होता कि ये रईस किसी गरीब का बच्चा गोद लेकर उसका जीवन संवार देते......शायद वो उनके लिए कुत्ते से तो अधिक बेहतर सिद्ध होकर दिखा ही देता.....आशा है कि आप समर्थन देंगे.....
आपका ही सचिन......।
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