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17 मार्च, 2008

 

• संवेदनशून्य होता हमारा समाज

अनुपम मिश्र

जब दिल्ली रहा करता था तो श्री अनुपम मिश्र से मेरी भेंट होती रहती थी.........मैंने उनसे कई बातों के साथ विनम्रता का पाठ भी सीखने की कोशिश थी.....शायद थोड़ा कामयाब हुआ होऊंगा.......उनकी दी हुई किताबें आज भी खरे हैं तालाब और राजस्थान की रजत बूंदे मेरे लिए आज भी धरोहर समान हैं.......मैं उनका यह लेख प्रकाशित कर प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ.......आगे भी उनके लेख लेता रहूँगा........यह लेख वैबदुनिया पहले ही प्रकाशित कर चुका है........सचिन   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: जल-जंगल-जमीन
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