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21 मार्च, 2008

 

• यहाँ थी वह नदी

मंगलेश डबराल

कहा जाता है, जहाँ ना पहुँचे रवि...वहाँ पहुँचे कवि.....कवियों ने हमेशा देश-समाज और प्रकृति की ओर हमारा ध्यान दिलाया है और उन सबका ध्यान रखा है.......मंगेश डबराल साहब ने भी हमेशा पहाड़ और नदियों की बातें की हैं......हमें उन सबके नजदीक ले जाकर छोड़ा है.......पेश है नदी के ऊपर उनकी एक मार्मिक कविता.......सचिन   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: साहित्य
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• शक्ति और क्षमा

रामधारी सिंह "दिनकर"

दुनिया शक्ति का ही सम्मान करती है......यह बात सबको पता है.....संसार में इसी की माँग है.....उगते सूर्य को ही सब प्रणाम करते हैं......बचपन से ही आदरणीय दिनकर साहब की यह कविता मेरी पसंदीदा है......मैं चाहता हूँ कि हर भारतवासी इसे पढ़े और अपने जीवन में अपनाए.....सचिन   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: साहित्य
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• रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है

क्रांतिकारी विचारधारा के यूजी कृष्णमूर्ति से एक प्रश्न

एक आदमी , जिसने पहली बार ज्ञान और बोध को अस्तित्व की न्यूरो बायोलोजिकल अवस्था के रुप मे देखा। जिसने कहा कि इसका धार्मिक , मनोवैज्ञानिक या रहस्यवादी आशयों से कोई संबंध नही है। यह एक बिकुल नयी अवधारणा है , "प्रबुध्धता" जैसी चीज़ के प्रति वास्तव मे एक ...   और पढ़ें...
श्रेणियाँ: चिंतन
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