
भारत की यात्रा के दौरान एक चीज आपको सहज रखती है और वह है अंग्रेजी भाषा। इसके जरिए इस देश में आप अमूमन हमेशा लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। यहां तक कि वे भारतीय भी, जो अंग्रेजी के महज कुछ शब्द ही बोल पाते हैं, अपनी तरफ से आपकी मदद में कोई कसर नहीं छोड़ते। कई बार तो इसके नतीजे बड़े अटपटे निकलते हैं, लेकिन फिर भी वे कोशिश तो करते ही हैं। इसके बरक्स मैं पहली बार हांगकांग गया, तो मुझे उस वक्त धक्का लगा था जब मैंने ट्राम स्टॉप पर एक आदमी से मदद मांगी और वह मेरी तरफ पीठ करके खड़ा हो गया।
लेकिन अगर इस देश ने आजादी के समय मध्यमार्ग को नहीं अपनाया होता तो वह अपनी अंग्रेजी को गंवा चुका होता। उस वक्त कई राष्ट्रवादी लोग थे, जो अंग्रेजी को गुलामी के एक प्रतीक के तौर पर ही देखते थे और इसे भारत के भाषाई नक्शे से मिटा देने की ख्वाहिश रखते थे। खुशकिस्मती की बात है कि ऐसा नहीं हुआ और एक संतुलन तलाश लिया गया। अंग्रेजी को कायम रखते हुए देश के राज्यों का बंटवारा भाषाई आधार पर कर दिया गया, ताकि देश का हर हिस्सा अपनी मातृभाषा का पालन-पोषण कर सके और अंग्रेजी को एक राष्ट्रीय विरासत के तौर पर कायम रखा जा सके।
यह भारत की आजादी की 60वीं वर्षगांठ का साल है। जो विदेशी टूरिस्ट नई दिल्ली में अंग्रेजी राज की आखिरी वास्तु निशानी लुटियंस इलाका देखने के लिए आएंगे, वे उस बगीचे में भी जाएंगे, जहां महात्मा गांधी ने अपनी आखिरी प्रार्थना की थी। जिस घर में वे रह रहे थे, आज उसके भीतर एक म्यूजियम मौजूद है। यह म्यूजियम उस इंसान की दास्तान बयां करता है, जिसने मध्यमार्ग की भारतीय परंपरा को कायम रखा। उसने एक ऐसा रास्ता अपनाया, जो विदेशी शासन को निष्क्रिय रहकर स्वीकार करने और इसके हिंसक विरोध के बीच से होकर गुजरता था।

मध्यमार्ग पर चलने के लिए उदार मानसिकता की जरूरत होती है। लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत में जिस ब्रिटिश अफसर ने संयोग से खजुराहो के मंदिरों को खोज निकाला, उसे लगा था कि हिंदुत्व ने खुले दिमाग का कुछ जरूरत से ज्यादा ही मतलब लगा लिया है। मंदिरों की नर्म बलुए पत्थर की दीवारों पर खुदी इन उत्तेजक मूर्तियों को उसने शर्मनाक बताया। लेकिन ज्यादातर लोग खजुराहो की मूर्तियों को किसी सेक्स मैनुअल के तौर पर नहीं देखते, हालांकि कुछ इसके अपवाद भी होते हैं। खजुराहो की अपनी पहली यात्रा के दौरान मैंने एक हैरान सिख युवक को कहते सुना, यह मुमकिन नहीं है। वह नौजवान एक मूर्ति को ताक रहा था, जिसमें एक व्यक्ति सिर के बल योग मुद्रा में खड़ा है और उस पर बैठकर एक महिला काम क्रीड़ा कर रही है। तभी उस युवक का दोस्त बोला- यह मुमकिन है, मैंने इसे करके देखा है।
लेकिन भारतीय विद्वान इस वास्तुशिल्प को पवित्रता और भोग के संगम के तौर पर ही देखा करते हैं- एक ऐसा मेल जो भोग को लेकर शर्मिंदा नहीं होता, बल्कि इसे पवित्रता से जोड़ देता है, जबकि ब्रिटेन में हम सेक्स को लेकर दो अतिवादों के बीच झूलते रहे हैं। एक तरफ थी विक्टोरियन काल की मान्यताओं से उपजी शर्म, जिसका असर मेरे बचपन पर भी रहा और दूसरी तरफ है सेक्स को सिर्फ मौज-मजा समझने की आदत। पवित्रता और भोग के बीच भारत जैसे किसी मध्यमार्ग की तलाश करने में हम नाकाम रहे।
मध्यमार्ग पर चलने के लिए यह जरूरी होता है किसी धुन या मोह से बचा जाए। चूंकि भारत पर इफिशंसी की धुन सवार नहीं हुई है, इसलिए यह कई बार इतना अक्षम दिखाई देने लगता है, जितना कि असल में है नहीं। साल 1965 की तुलना में तो यह बहुत सक्षम हो चुका है, जब मैं पहली-पहली बार यहां आया था। उस वक्त अगर आपको ट्रेन का रिटर्न टिकट चाहिए होता था, तो यात्रा पर निकलने से पहले गंतव्य स्टेशन के स्टेशन मास्टर को इसका अनुरोध करते हुए एक टेलीग्राम भेजना पड़ता था। कोई जरूरी नहीं था कि वह आपका टिकट कन्फर्म करते हुए जवाब दे ही। वह जवाब दे भी सकता था और नहीं भी। लेकिन आज आप इंटरनेट पर कहीं से कहीं के लिए टिकट खरीद सकते हैं।
90 के दशक तक अगर आप भारत में कार से कहीं घूमने जाना चाहते थे, तो आपके सामने सिर्फ एक चॉइस थी- ऐंबैसडर कार, जो 40 के दशक की मॉरिस ऑक्सफर्ड का भारतीय संस्करण है। बीच-बीच में आपको मिकेनिक के यहां रुककर उसकी मरम्मत भी करवानी पड़ती थी। लेकिन आज भारत में उससे भरोसेमंद और मॉडर्न कारें उपलब्ध हैं। भारत उन्हें दुनिया के दूसरे देशों को भी बेच रहा है। यह सही है कि आज भी यहां होटलों की कमी है, लेकिन अगर आपको कमरा मिल गया, तो फिर आप बेहतरीन सेवाएं पाएंगे। 60 के दशक में तो होटल लगभग नहीं के बराबर थे। लेकिन अब भी भारत उन लोगों के लिए नहीं है, जो हवा में एक इंच भी झुकने के लिए तैयार नहीं हैं, जो अनपेक्षित घटनाओं का सामना नहीं कर सकते। महात्मा गांधी ने कहा था कि उन्होंने कभी सातत्य (कंसिस्टेंसी) से खुद को मोह नहीं पालने दिया। उनके लिए हिंदू धर्म इतना विराट है कि इसकी छत्रछाया में हर तरह की आस्था समाहित हो जाती है। हैरानी की बात नहीं है कि महात्मा गांधी के देश पर इफिशंसी का वह भूत सवार नहीं हुआ, जिसे सातत्य की जरूरत पड़ती है और जो किसी भी काम को करने का सिर्फ एक ही तरीका जानता है।
