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इंदौर में भूकंप आया तो...!!!!

सचिन शर्मा

चीन में आए भूकंप और उससे हुई भारी तबाही ने भूकंप को लेकर फिर से कुछ आशंकाएँ और कुशंकाएँ पैदा कर दीं। तो पेश है हमारे शहर को उस कैनवास में रखकर एक रिपोर्ट....


इंदौर। शहर में दिनों दिन आसमान छूते प्रापर्टी के भाव और नई बनती आलीशान इमारतों के बीच शहरवासी एक ऐसी चूक कर रहे हैं जिसकी भरपाई आसानी से नहीं हो सकती। इंदौर भूकम्प के जोन-3 में आता है। फिलहाल यह भूकम्प के मामले में शांत इलाका है, लेकिन कभी नर्मदा जोन के कारण यहाँ भूकम्प आया तो शहर की ज्यादातर इमारतें उसके सामने खड़ी नहीं रह सकेंगी।

कहाँ होती है चूक, बचाव
भूकम्प से बचाव के लिए इमारतें बनाने से पहले भारतीय मानक 13920 के विशेष प्रावधानों को लागू किया जाना चाहिए। इसके अनुसार जोन 3 से 5 तक इमारतों में बीम और कॉलम में डाले जाने वाले सरियों के लिए विशेष प्रावधान रहते हैं जिनका सख्ती से पालन होना चाहिए। इससे भूकम्प आने पर इमारत के ढहने का खतरा कम हो जाता है और उनकी भूकम्परोधी क्षमता बढ़ जाती है। इन प्रावधानों के पालन होने से इमारतें क्षतिग्रस्त तो हो सकती हैं लेकिन वे ढहने से बच जाएँगी। भूकम्प विरोधी प्रावधानों में बहुत बिंदु हैं जिन्हें किसी भी स्ट्रक्चर इंजीनियरसे समझा जा सकता है। लेकिन मोटे तौर पर यह ध्यान रखना चाहिए कि इमारत में डलने वाले कॉलम और सरियों में बनी रिंग्स पास-पास होनी चाहिए। जबकि आमतौर पर वह दूर-दूर होती है। बीम की चौड़ाई और जमीन में उसके जाने की गहराई भी प्रावधानों में निर्धारित है, उसके अनुसार ही इन्हें डालना चाहिए। वर्तमान में इस्तेमाल हो रहे 200 एमएम के सरिए तो प्रावधानों में बहुत खतरनाक बताए गए हैं जिनका इस्तेमाल भूकम्परोधी इमारतों में निषेध है लेकिन आमतौर पर शहर में इनका ही इस्तेमाल इमारतें बनाने में हो रहा है।

क्या होते हैं भूकम्प के जोन?
भारतीय भूगर्भ परिस्थितियों के अनुसार भूकम्प के खतरे को देखते हुए देश को चार जोनों में बाँटा गया है। इन्हें 5, 4, 3 और 2 जोन कहा जाता है। इनमें से 1 और 2 जोन को आपस में मिला दिया गया है। इस जोन में बहुत कम तीव्रता के भूकम्प आते हैं जिनसे नुकसान की संभावना नहीं होती। जोन 3 में 4 से 6 रिक्टर स्केल तक के भूकम्प आते हैं। 4 और 5 जोन सबसे खतरनाक जोन हैं और इनमें 6 से 10 रिक्टर स्केल तक के भूकम्प आ सकते हैं। इंदौर जोन 3 में आता है। यह क्षेत्र मुख्यतः नर्मदा जोन से प्रभावित है जो मुख्य शहर से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित है।

क्यों आता है भूकम्प...?
पृथ्वी की सतह के नीचे (अर्थ क्रस्ट में 10 से 60 किलोमीटर अंदर) स्थित टेक्टोनिक प्लेट्स (महाद्वीपीय प्लेट्स) की सीमा ही भूकम्प के लिए जिम्मेदार है। यह प्लेट्स हिलती रहती हैं। इन प्लेट्स में जहाँ भी फाल्ट्स होते हैं वहीं भूकम्प भी आते हैं। जो भूकम्प इन प्लेट्स की बाउण्ड्री (इंटर-प्लेट्स) पर आते हैं वे ज्यादा खतरनाक होते हैं। सुनामी इसी प्रकार के भूकम्प के कारण बनी थी। दूसरे वह भूकम्प होते हैं जो इन प्लेट्स के अंदर (इंट्रा प्लेट्स) से पैदा होते हैं। ये कम खतरनाक होते हैं। नर्मदा जोन में इसी प्रकार के फाल्ट्स हैं।

क्या होती है रिक्टर स्केल...
रिक्टर स्केल भूकम्प की शक्ति मापने का पैमाना है। इस यंत्र से यह पता लगता है कि भूकम्प ने कितनी ऊर्जा का उत्सर्जन किया और उसको पैदा करने के लिए जमीन के अंदर प्लेट्स कितनी खिसकी होंगी। एक और दो रिक्टर स्केल में ऊर्जा के उत्सर्जन में 30 के अनुपात का अंतर होता है।

भारत और संसार के बड़े भूकम्प...
रिक्टर स्केल पर 10 शक्ति का भूकम्प सबसे भयानक माना जाता है। इतनी शक्ति का भूकम्प अभी तक संसार में कही नहीं मापा गया। चिली, जापान और अमेरिका में 9.1 शक्ति तक के भूकम्पों को मापा गया है। इंडोनेशिया में दो वर्ष पूर्व आई सुनामी समुद्र की सतह में भूकम्प की वजह से ही आई थी। उस भूकम्प की शक्ति भी 9.1 ही मापी गई थी। भारत में 8.1 शक्ति तक के भूकम्प आए हैं। असम और उत्तरकाशी में इस स्तर के भूकम्प मापे गए हैं। 2002 में भुज में आया भूकम्प (इसके झटके इंदौर में भी महसूस किए गए थे) 7.8 शक्ति का था।

रहवासी इमारतें सुरक्षित नहीं...
इस बारे में इंदौर के इंजीनियरिंग कॉलेज जीएसआईटीएस के सिविल विभाग में प्रोफेसर और भूकम्परोधी संरचना एवं निर्माण विषय के विशेषज्ञ डॉ. राकेश खरे कहते हैं कि फिलहाल बन रहीं बड़ी सरकारी इमारतों को इंजीनियर्स भूकम्परोधी सर्टिफिकेट तो दे देते हैं, लेकिन यह बात प्रमाणित नहीं हो पाती कि यह कितना सही है। लेकिन भुज के भूकंप के बाद शहर में बन रहीं सरकारी बड़ी इमारतों को तो भूकम्परोधी बनाए जाने की कोशिश हो रही है लेकिन निजी रहवासी इमारतों में तो बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जा रहा।

इंदौर में भूकम्प के झटके...
शहर के समीप ही स्थित ग्राम माचला में मार्च 1938 में भूकम्प का जबर्दस्त झटका महसूस किया गया था। एक वर्ष बाद वहाँ फिर झटका महसूस किया गया था। इन झटकों से गाँव के कुछ मकानों में तो दरारें तक आ गई थीं। 27 सितंबर 1990 और बाद में 3 सितंबर 1994 में यहाँ पुनः भूमिगत धमाके सुने गए थे जो कई दिनों तक सुनाई पड़े थे। 2002 में गुजरात के भुज में आए भूकम्प के झटकों ने भी इंदौर को थर्राया था। इंदौर में 2 और 3 रिक्टर स्केल तक के भूकम्प 50 वर्ष पहले या स्वतंत्रता मिलने के पहले आए थे। अभी तक किसी भी भूकम्प का केन्द्र तो इंदौर नहीं रहा है लेकिन अगर किसी दिन नर्मदा जोन में भूकम्प आया तो निश्चित ही इससे इंदौर प्रभावित होगा। कुछ वर्षों पहले जबलप