महेश भट्ट का हाल ही में मैंने बीबीसी पर एक इंटरव्यू पढ़ा था। उसमें वे कह रहे थे कि वे संत नहीं वेश्या बनना पसंद करेंगे। वे अपनी नई आने वाली फिल्म जन्नत के बारे में कह रहे थे और संदर्भ था क्रिकेट खिलाड़ी.....फ़िल्म जन्नत में भट्ट के चहेते भांजे इमरान हाशमी ने एक सट्टेबाज़ की भूमिका की है। फ़िल्म में एक जगह उनका चरित्र कहता है- देखिए सर, क्रिकेटर और वेश्याओं के बीच ज़्यादा फ़र्क नहीं होता। दोनों की जवानी ख़त्म तो कहानी ख़त्म। इस डॉयलॉग पर जब भट्ट से पूछा गया तो वे कहते हैं- जी हाँ, जन्नत में ठीक यही संवाद है, लेकिन इसमें ग़लत क्या है। अगर आप इस बारे में सोचें तो हम सभी वेश्या ही तो हैं। कम से कम ये अपना वादा तो पूरा करती हैं। मैं भी वेश्याओं से अलग नही हूँ, मैं भी आनंद बेचता हूँ, और हाँ मैं तो संत के बजाए वेश्या बनना पसंद करूँगा।
तो भट्ट साहब मैं आपकी बात से असहमति जताते हुए कह रहा हूँ कि ये वेश्यापना आपको ही मुबारक......आपके ऊपर यह शब्द फबता भी है और हाँ, मैं क्या इस लेख को पढ़ने वाले सभी लोगों या पाठकों में से वेश्या बनना तो कोई भी पसंद नहीं करेगा..........। हाँ आपके साथीगण और वो इमरान हाशमी तो जरूर कर सकते हैं क्योंकि हाशमी तो आपकी फिल्मों में भी वेश्याओं वाली भूमिका ही करते रहे हैं बस फर्क इतना है कि वो औरत ना होकर गलती से मर्द है........।
तो दोस्तों आपसे कुछ बातें शेयर करना चाहूँगा........जब मैं किशोरवय का था तो हमारे यहाँ भी दूरदर्शन ही चलता था। उसमें एक कार्यक्रम आया करता था जो अभी भी आता है, अर्थ मैटर्स। मैं इस कार्यक्रम का दीवाना था क्योंकि मुझे हमेशा से ही विज्ञान और प्रकृति से जुड़े मुद्दे लुभाते रहे हैं। तो मैं इसे बहुत ध्यान से देखता था। इसे तब प्रोफेसर यशपाल प्रस्तुत करते थे। फिर प्रीतिश नंदी आए.....फिर माइक पांडे आए और फिर महेश भट्ट भी आए। भट्ट साहब का व्यक्तित्व देखकर मैं प्रभावित रहा करता था.....वे हैण्डसम तो थे ही, साथ में ज्ञानवान भी थे......मैं उनकी बातें भी बड़ी ध्यान से सुना करता था......मुझे नहीं पता था कि आगे जाकर यही बुद्धिजीवी व्यक्ति पगला जाएगा और मर्डर सरीखी फिल्में बनाएगा......परवीन बॉबी से अपने रिश्तों की बयानी कुछ इस प्रकार करेगा या उनपर फिल्म बनाने की भी सोचेगा.........और सबसे बड़ी बात कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री को हाशमी जैसा एक नंगा हीरो देगा जो फिल्मों में कमसिन और मजबूर लड़कियों (इस अर्थ में कि एेसी लड़कियाँ फिल्मों में पैर जमाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती हैं) को चूमता-चाटता रहेगा..........।
तो भई मैं हैरान हूँ कि उस बौद्धिक व्यक्ति को एकाएक यह क्या हो गया कि उसे सेक्स के अलावा और कुछ सूझ ही नहीं रहा है.......वह खुलेआम बयान दे रहा है कि सेक्स सबकी जरूरत है और यह भी कि वह खुद एक वेश्या बनना पसंद करेगा........मेरे दिमाग से तो अर्थ मैटर्स के समय से जमी हुई धूल चार साल पहले ही साफ हो गई.........।
एक और किस्सा सुनाता हूँ.......सत्य है, आप भी सोचिएगा....।
मैं चार साल पहले दैनिक भास्कर के जयपुर संस्करण में था..........तभी मर्डर फिल्म रीलीज हुई थी.......मैं और मेरा एक मित्र (जो मेरे साथ ही रिपोर्टर था) के पास वहाँ के एक मल्टीप्लेक्स में रीलीज हुई मर्डर के पास आए.....हम इस फिल्म को देखने गए......उस फिल्म में तब जबरदस्त भीड़ उमड़ रही थी.......फिल्म कैसी थी यह आप सबको पता है.....बस इस फिल्म को देखकर यह हुआ कि मैं इस महेश भट्ट के ऊपर जबरदस्त खिसिया गया......मुझे लगा कि इस पागल आदमी का गुरूर तो तोड़ना ही चाहिए जो अपनी सारी बातों को सही करार देता रहता है......खैर भगवान ने मेरी इस मामले में सुन ली और इस घटना के लगभग दो महीने बाद इसी इमरान हाशमी की एक फिल्म दीया मिर्जा के साथ आई.......नाम मैं भूल रहा हूँ लेकिन इस फिल्म में हाशमी पहले ही सीन में दीया का जबरदस्ती पकड़कर होठों पर चुंबन ले लेता है.......तो साहब इस फिल्म की जयपुर के लॉस-वेगास होटल में प्रेस कांफ्रेंस थी......भट्ट, दीया और हाशमी को लेकर आए थे......मुझे ही अपने अखबार की ओर से इस प्रेस कांफ्रेंस में जाना था.....मैंने दूसरे अखबारों के अपने साथियों से तैयार रहने को कहा जो कि मेरे मित्र भी थे........प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई, थोड़ी देर की लफ्फाजी के बाद भट्ट ने हमसे कहा कि अगर आप लोगों को कोई सवाल पूछना हो तो पूछिए......मैंने उस दीया से पूछा जो मिस इंडिया भले ही रही हो लेकिन उस समय छिपकली जैसी लग रही थी और वो हाशमी भी किसी साढ़े पाँच फुटे बच्चे जैसा ही है भले ही फिल्मी पर्दे पर कैसा भी दिखता हो........... तो मैंने उस दीया से पूछा कि ये चुंबन सीन देने की जरूरत थी क्या इस फिल्म में....?? वो बोली इसमें दिक्कत ही क्या है यह फिल्म की जरूरत थी......बस फिर क्या था हमने इन तीनों की एेसी खाल उतारी कि थोड़ी देर बाद वो दीया तो उठकर भाग ही खड़ी हुई और भट्ट और हाशमी के चेहरे उतर गए.......हमने उन तीनों को खूब मजाक उड़ाया और यह भी जता दिया कि उनके इन चुंबन दृश्यों और मर्डर जैसी फिल्मों की किसी को जरूरत नहीं है......और ना ही ये फिल्में समाज को किसी तरह का कोई संदेश देती हैं........
तो साहब भट्ट की बोलती बंद कर दी हमने.....उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था....आयोजकों ने इस प्रेस कांफ्रेंस को बंद करवाया......हम लोग उठकर चले आए......बाद में मुझे पता चला कि वो मेरे बारे में राजस्थान पत्रिका के एक रिपोर्टर से पूछ रहा था कि ये कौन है.......जब उसने बताया कि वो भास्कर का रिपोर्टर था तो भट्ट ने कहा, अजीब लड़का है, मैं इसके अखबार का अतिथि संपादक हूँ (तब भट्ट नवरंग के अतिथि संपादक थे) और ये मुझे ही नहीं छोड़ रहा है.......खैर इस बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इतना तय है कि एेसे लोगों को जहाँ मिलें जलील जरूर करना चाहिए क्योंकि इन्हें गुरूर रहता है कि वे जो कर रहे हैं या सोच रहे हैं या
