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खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब!

खेल और अन्य क्षेत्रों में हमारे बच्चे और युवा पिछड़ रहे हैं

खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब
पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब


हमारे महान देश में यह उक्ति हम बरसों से सुन रहे हैं। बचपन से अभी तक मैंने भी इसे हजारों बार सुना है लेकिन यकीन मानिए मैं इसपर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता। कारण है, कि इस उक्ति को दिल से मानकर हमने क्या पाया? खेलों को बुरा मानकर हमने क्या पाया? कुल मिलाकर इस उक्ति के कारण हमेशा हमारी नाक ही कटी है क्योंकि खेल किसी व्यापार और व्यवसाय की तरह ही एक बड़ा कैरियर है लेकिन अभी हमारा देश और यहाँ का समाज इसे समझ पाएँ इसकी गुंजाइश कम ही नजर आती है।

दोस्तों, अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग में ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतकर हमारे देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। आज हर माता-पिता और हर बच्चे और युवा को लग रहा है कि काश वो भी इतनी बड़ी उपलब्धि पा पाते। वैसे इस बात का एक दूसरा पहलू भी है कि अभिनव के पिता एएस बिंद्रा ने अभिनव की इस हसरत (ओलंपिक गोल्ड जीतने की) को पूरा करने के लिए पानी की तरह रुपया बहाया और कुल मिलाकर देखें तो उन्होंने अभिनव के १० साल के कैरियर में १० करोड़ रुपया लगा दिया। कई लोगों को यह रकम सुनकर ऐसा लग सकता है कि १० करोड़ में तो ऐशोआराम का जीवन आसानी से काटा जा सकता है, एक बहुत बड़ा व्यापार शुरू किया जा सकता है, फिर इसे एक खेल विशेष पर खर्च करने की क्या तुक है? लेकिन सोचिए कि इस देश में करोड़पति और अरबपति तो ढेरों हैं। बड़े व्यापारी और व्यवसायी भी बहुत हैं लेकिन क्या उन्हें अपने जीवन में अभिनव जैसी शोहरत मिल पाएगी। और क्या अब अभिनव इस शोहरत के बलबूते पर जो कमाई करेगा उससे उसे उन १० करोड़ रुपयों से कई गुना ज्यादा रकम नहीं मिल जाएगी...?? तो हम लोग हिम्मत क्यों नहीं करते हैं इस क्षेत्र में हाथ आजमाने की, और क्यों हमारा परिवार और समाज हमें इसके लिए सपोर्ट नहीं करता..??

हमारे वेदों और शास्त्रों में लिखा है कि रुपया कमाने से भी ज्यादा बड़ा काम यश अर्जित करना है। इसलिए रामायण और महाभारत में हमने राजाओं और महाराजाओं को ऋषि-मुनियों से यशस्वी भवः का आर्शीवाद लेते देखा, सुना और पढ़ा है। तो जो आर्थिक रूप से अधिक सक्षम हैं उन्हें महंगे खेल और जो अपेक्षाकृत मध्यमवर्गीय हैं उन्हें दूसरे खेलों का चुनाव करना चाहिए क्योंकि खेल तो बहुत सारे हैं ना। वैसे मुझे यह बताते हुए दुख हो रहा है कि मैं हॉकी में तीन नेशनल खेला, विश्वविद्यालयीन और राज्य स्तर पर तो खेली ही, लेकिन किसी ने भी मुझे इस खेल को कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। आज वो सर्टिफिकेट मेरी फाइल में सजे रखे हैं और उनका मुझे कोई लाभ नहीं मिला।

खैर, मैं खेलों के पक्ष में आप लोगों को एक बात और बताना चाहता हूँ। कहा जाता है कि योरप के फुटबॉल खिलाड़ियों की कमाई कई उद्योगों से होने वाली कुल कमाई से बहुत ज्यादा होती है। वहाँ फुटबॉल के खिलाड़ियों को सेलीब्रिटी का दर्जा प्राप्त है, और उनमें से कई खिलाड़ियों को तो किसी दूसरे देश में जाने पर राष्ट्राध्यक्षों का सा सम्मान और प्रोटोकॉल दिया जाता है। तो बताइए कि हमारे देश में जिस आईटी, शेयर और बीपीओ की भेड़चाल चल रही है, क्या उसमें ऐसा यश किसी को नसीब हो सकता है? आज भारत की ११० करोड़ आबादी में से हम एक ढंग की १६ खिलाड़ियों वाली फुटबॉल टीम भी नहीं निकाल पाए। जबकि फुटबॉल विश्वकप को ओलंपिक के बाद खेलों का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है जिसके क्वालिफाइंग राउंडों में कोई १६० देश आपस में उलझते हैं और कई स्तरों को पार करने के बाद ३२ देशों की टीमें इस विश्वकप में भाग ले पाती हैं। हमारा महान देश भारत फुटबॉल की विश्व रैंकिंग में १५३ वें स्थान पर है और उससे हैती, माल्टा, फीजी, लिबीया, हांगकांग जैसे छोटे देश भी आगे हैं। उल्लेखनीय है कि संसार के २१९ देशों में से २०० देश फीफा (फुटबाल की विश्व संस्था) के सदस्य हैं और उनमें से हम १५३ वें स्थान पर हैं। शर्म है हम पर.......।

दोस्तों, हर बार ओलंपिक में हमारे देश का दल जाता है और जलील होकर आ जाता है। हम अपने खिलाड़ियों को बड़ी आशाओं के साथ वहाँ भेजते हैं लेकिन दूसरे दिन से ही खबरें आने लगती हैं कि भारत के फलां खिलाड़ी को फलां खेल के क्वालिफाइंग राउंड में निराशा हाथ लगी। आखिर ये निराशा हमारे हाथ कब तक लगती रहेगी? अब चूंकी अभिनव ने ओलंपिक में भारत के लिए सोने पर निशाना साधकर खेलों को वापस लाइमलाइट में ला दिया है तो इस विषय पर बहस होना लाजिमी है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ओलंपिक खत्म होते ही हम सब लोग फिर से अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाएँगे और खेल फिर से हाशिए पर आ जाएँगे, कुछ ऐसी ही आशंका के चलते अभिनव ने कल कहा था कि शायद उनकी इस उपलब्धि के बाद अब भारत में खेलों के ऊपर कुछ ध्यान जाए।

अभिनव ने भारत के युवाओं को कुछ कर दिखाने के लिए प्रेरित किया है। हमें टाइगर वुड्स, मैजिक जान्सरन, माइकल शूमाकर, डेविड बैकहम, रोनाल्डिन्हो सरीखे नामों से कुछ सबक सीखने चाहिए जिनकी कमाई रिकार्डतोड़ है और जो एकाध करोड़ डॉलर की राशि तो किसी आपदा में यूँ ही दान कर देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सुनामी प्रभावित लोगों को शूमाकर ने एक करोड़ डॉलर की सहायता राशि दी थी। हमें क्रिकेट की ओर भी देखना कम कर देना चाहिए क्योंकि ११० करोड़ आबादी वाले देश की तमन्ना सिर्फ ११ खिलाड़ियों वाला एक खेल पूरा नहीं कर सकता। हमें भी चीन की तरह १०० खेलों पर ध्यान देना चाहिए, फिर भले ही वो अंतरराष्ट्रीय हों या पारंपरिक। हमारे समाज को खेल खेलने और उसमें कैरियर बनाने के लिए अपने बच्चों और युवाओं को सपोर्ट करना सीख लेना चाहिए....हमें यह अब यह बोलना सीख लेना चाहिए कि.....

खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे नवाब।

आपका ही सचिन.....।
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