पानी को लेकर फिलहाल दुनिया में जो स्थिति चल रही है वो किसी से छुपी नहीं है फिर भी इस बात को बहुत हल्के से जा रहा है। छह साल पहले 5 जून 2003 को मनाए गए विश्व पर्यावरण दिवस (वर्ल्ड एनवायरमेंट डे) की थीम पानी के ऊपर ही रखी गई थी। उसका शीर्षक 'पानी-इसके लिए दो अरब लोग मर रहे हैं" भी बहुत सावधानीपूर्वक रखा गया था। किन आज जब हम पलटकर पीछे देखते हैं तो अपने को वहीं खड़ा पाते हैं जहाँ छह साल पहले थे। इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने पानी को लेकर बहुत जोर गाया। 2003 में उसके तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान पानी को लेकर गंभीर थे और वर्तमान महासचिव बान की मून भी पानी, मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग को लेकर बहुत चिंतित हैं। लेकिन दुनिया को शायद इस बात की महत्ता अभी तक समझ नहीं आई है, इसलिए इस समस्या का कोई ठोस हल भी नहीं खोजा गया है। मामला फिलहाल बिगड़ता चला जा रहा है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में 112 करोड़ आबादी वाले भारत को इस स्थिति से सबसे अधिक खतरा है।
यूँ संसार को देखें तो इसका 75 प्रतिशत भाग पानी है। यहाँ सागर हैं। महासागर हैं। बड़ी-बड़ी खाड़ियाँ हैं। लेकिन यह हमारे किसी काम के नहीं हैं। यह सब 'नमकीन" हैं। हम इन्हें पीने के उपयोग में नहीं ले सकते, इनसे खेती नहीं कर सकते। हाँ, यह अलग बात है कि ये पानी के अथाह भंडार विश्व के वायुमण्ड, तापमान और मौसम को नियंत्रित करने में महती भूमिका निभाते हैं लेकिन हमारे जिंदा रहने के लिए जरूरी पीने का पानी इन स्त्रोतों से नहीं मिल सकता। दुनिया में पानी का सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही 'मीठा" है। इस ढाई प्रतिशत 'मीठे पानी" का भी 75 प्रतिशत भाग 'ग्लेशियर" और 'आइसकैप्स" के रूप में संरक्षित है। ये ग्लेशियर और आइसकैप्स दुनिया की दुर्गम जगहों पर स्थित हैं और हर किसी की वहाँ तक पहुँच संभव नहीं। 'ग्लोबल वार्मिंग" के चलते इन बर्फीले पानी के स्त्रोतों पर भी नजर लग रही हैं और ये पिघल रहे हैं। इनके पिघलने से मीठा पानी कई जगह नमकीन समुद्री पानी से मिलकर बेकार हो जाता है। आर्कटिक और अंटार्कटिक से पिघ कर बह रहा मीठा पानी इसका उदाहरण हैं।
मानव की पहुँच की बात करें तो मीठे पानी का सिर्फ 0.3 प्रतिशत ही नदियों और तालाबों जैसे स्त्रोतों में मिलता है। बाकी जमीन के अंदर भू-जल के रूप में संरक्षित है। लेकिन ये सभी स्त्रोत भी धीरे-धीरे सूख रहे हैं। इन स्त्रोतों को बचाने लिए विश्व में कहीं भी युद्ध स्तर पर काम नहीं हो रहा है जबकि वो होना चाहिए। पानी की कमी से बाकी विश्व तो जूझ ही रहा है लेकिन एशिया इसकी भयंकर चपेट में है। एशिया में दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है इसलिए जल संकट का सबसे अधिक सामना भी यही महाद्वीप कर रहा है। लेकिन इस महाद्वीप में भी दक्षिण एशिया की लत सबसे अधिक खराब है जहाँ की 90 प्रतिशत आबादी जल संकट का सामना कर रही है। भारत भी दक्षिण एशिया का ही हिस्सा है। 'ग्लोबल एनवायरमेंट आउटलुक" (जीयो-3) की रिपोर्ट के अनुसार 2032 तक संसार की आधी से अधिक आबादी भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएगी। अगर एक बार ऐसा हो गया तो संसार के लोग सिर्फ पीने के पानी की कमी से ही नहीं जूझेंगे, संसार में बीमारियाँ भी पैर फैलाएँगी। पहले से ही गरीबी में जी रहे अल्पविकसित और विकासशील देशों के लोग डायरिया, टायफायड और हैजा जैसी जानलेवा बीमारियों के शिकार बनेंगे जो खराब पानी से ही फैलती हैं। एक अध्ययन के अनुसार संसार में हर आठ सेकण्ड के भीतर एक बच्चा जल जनित बीमारी का शिकार होकर मारा जाता है। पूरे वर्ष में ऐसे मरने वाले बच्चों की संख्या डेढ़ करोड़ है।
वर्ल्ड हैल्थ ओरगेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की बड़ी आबादी तो पीने और खाना बनाने के लिए ही पानी की जुगाड़ मुश्किल से कर पाती है। ऐसे लोगों के लिए भविष्य में जीने का संकट उत्पन्न हो जाएगा। इस रिपोर्ट के अनुसार संसार के उद्योग बचे-खुचे साफ पानी को भी दूषित किए दे रहे हैं। फिर उस पानी का कभी उपयोग नहीं हो पाता। रिपोर्ट बताती है कि एशिया में उद्योगों से निकलने वाला 35 प्रतिशत पानी ही 'ट्रीट" होता है। जबकि दक्षिण अमेरिका में यह 14 प्रतिशत और अफ्रीका में तो नाममात्र का ही है। विकासशील देशों में पानी सप्लाई के दौरान भी इसका बड़ा हिस्सा 'लीक" होकर बह जाता है। ऐसी स्थिति में भी अगर भारत जैसे विकासशील देशों ने अपने जल प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा और इसका सबसे ज्यादा शिकार बनेंगे गरीब और मध्यमवर्गीय लोग जिनकी संख्या इस देश में 70 करोड़ है।
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