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  श्रेणियाँ > साहित्य  (8)

इस श्रेणी में हम साहित्य की गंगा में बहने-तैरने का आनंद लेंगे....आप सब लोगों के साथ यह आनंद मैं भी लूंगा....यह कहने की जरूरत नहीं कि साहित्य ही समाज का सच्चे रूप में आईना होता है और हम इस आईने में अपनी सूरत देखकर खुद का विश्लेषण भी करेंगे।

• Death

Rainer Maria Rilke

Come thou, thou last one, whom I recognize,unbearable pain throughout this bodys fabric:as I in my spirit burned, see, I now burn in thee:the wood that long resisted the advancing flameswhich thou kept flaring, I now am nourishinigand burn in thee.My ...   और पढ़ें...
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• अपने बारे में अज्ञेय

तारसप्तक में लिखे विचार

"मैं स्वान्त:सुखाय नही लिखता। कोई भी कवि केवल स्वान्त:सुखाय लिखता है या लिख सकता है, यह स्वीकार करने में मैंने अपने को सदा असमर्थ पाया है। अन्य मानवों की भांति अहं मुझमें भी मुखर है, और आत्माभिव्यक्ति का महत्व मेरे लिये भी किसी से कम नही है, पर क्या ...   और पढ़ें...
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• यहाँ थी वह नदी

मंगलेश डबराल

कहा जाता है, जहाँ ना पहुँचे रवि...वहाँ पहुँचे कवि.....कवियों ने हमेशा देश-समाज और प्रकृति की ओर हमारा ध्यान दिलाया है और उन सबका ध्यान रखा है.......मंगेश डबराल साहब ने भी हमेशा पहाड़ और नदियों की बातें की हैं......हमें उन सबके नजदीक ले जाकर छोड़ा है.......पेश है नदी के ऊपर उनकी एक मार्मिक कविता.......सचिन   और पढ़ें...
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• शक्ति और क्षमा

रामधारी सिंह "दिनकर"

दुनिया शक्ति का ही सम्मान करती है......यह बात सबको पता है.....संसार में इसी की माँग है.....उगते सूर्य को ही सब प्रणाम करते हैं......बचपन से ही आदरणीय दिनकर साहब की यह कविता मेरी पसंदीदा है......मैं चाहता हूँ कि हर भारतवासी इसे पढ़े और अपने जीवन में अपनाए.....सचिन   और पढ़ें...
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• मैं ने देखा, एक बूँद

अज्ञेय

मैं ने देखा एक बूँद सहसा उछली सागर के झाग से रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से। मुझ को दीख गया: सूने विराट् के सम्‍मुख हर आलोक-छुआ अपनापन है उन्‍मोचन नश्‍वरता के दाग से! अज्ञेय   और पढ़ें...
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• कितनी नावों में कितनी बार

अज्ञेय

कितनी नावों में कितनी बार कितनी दूरियों से कितनी बार कितनी डगमग नावों में बैठ कर मैं तुम्हारी ओर आया हूँ ओ मेरी छोटी-सी ज्योति ! कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल । कितनी बार मैं, ...   और पढ़ें...
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• प्रतीक्षा-गीत

अज्ञेय

हर किसी के भीतरएक गीत सोता हैजो इसी का प्रतीक्षमान होता हैकि कोई उसे छू कर जगा देजमी परतें पिघला देऔर एक धार बहा दे।पर ओ मेरे प्रतीक्षित मीतप्रतीक्षा स्वयं भी तो है एक गीतजिसे मैने बार बार जाग कर गाया हैजब-जब तुम ने मुझे जगाया है।उसी को तो आज भी गाता ...   और पढ़ें...
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• क्यों कि तुम हो

अज्ञेय

मेघों को सहसा चिकनी अरुणाई छू जाती हैतारागण से एक शान्ति-सी छन-छन कर आती हैक्यों कि तुम हो।फुटकी सी लहरिल उड़ानशाश्वत के मूक गान की स्वर लिपि-सी संज्ञा के पट पर अँक जाती हैजुगनू की छोटी-सी द्युति में नये अर्थ कीअनपहचाने अभिप्राय सी किरण चमक जाती हैक्यों कि ...   और पढ़ें...
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